Saturday, June 6, 2020

उसकी छवि

      उनके घर लोगों की भीड़ नहीं थी... एहसास भर था। भीड़ खिड़की पर टिकी उनके घर तक देखने की कोशिश कर रही थी। भीड़ की खुसर-पुसर उनके आंगन तक आ रही थी  आंगन पानी से धोया जा रहा था। एक तरफ छोटी सी लाइट जल बुझ रही थी। घर के सदस्य यहां वहां बैठे थे। अम्मा चौखट में बैठी थीं.. कोई और दिन होता तो वो जरूर कहती कि  सांझ बेला दुवार नहीं छेकते...इस वक्त उन्नत आती है घर।

      शोक कोने-कोने सिकुड़ा बैठा था। बाबू के कंधे पर, भाई के बाजु पर...और अम्मा के छाती पर। छोटी बहन बार-बार आंगन धो रही थी...वो आंगन के एक छोर तक पहुचती तो दूसरा छोर सुख जाता। सुखता आंगन से ज्यादा डर उसे विजय की सुखती छवि से आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि उसकी स्मृतियों से उसके छोटे भाई की सारी छवि खत्म हो रही है वो उन छवियों को ताजा रखना चाहती थी।

       अम्मा को जैसे याद आया कि सांझ हो गई है और वो दुवार पे बैठी हुई है। वहां से उठी.. आधा आंगन पार किया ही था कि वापस घर के अंदर चली गईं। बापू की सारी छटपटाहट सुन्न पड़ चुकी थी। उन्होंने मुंह खोला कि पानी मांगे... पर क्रिया कर्म तक कुछ नहीं पी सकते उन्हें याद आया.. फिर और  याद आया कि क्रिया कर्म करने को मिलेगा भी नहीं और फिर...उससे भी ज्यादा सवाल आया... क्या उनके विजय को देखने देंगे??...तभी अम्मा कमरे से आईं और आंगन से लिपट गईं।जैसे उनके बेटे का सीना हो...बहन बाल्टी छोड़ दी और भाई कोने की जलती बुझती लाइट देखता रहा।

     

Wednesday, April 29, 2020

कल्पना का अंत

           कल्पना क्या होती है? ये सवाल मेरे लिए अनेक संभावनाओं को जन्म देता है। और मैं निश्चित होने की धारा से बच जाता हूं आज मैं जो भी लेख लिखने का प्रयास कर रहा हूं वो आज तक की मेरी सोच समझ का परिणाम है।

          इंसानों​ का जिंदा रहना कल्पनाओं का अस्तित्व में रहना होता है। जब तक हमारी सांसें चलती है हम कल्पना की अथाह गहराई में डुबते चले जाते हैं। चेतन या अचेतन दोनों ही अवस्था हमारी कल्पना   हमारी समझ शक्ति तय करती है कि हम मानसिक तौर से कहा तक पहुंच पाए है ये दूसरी बात है कि मैं किसी मुकाम तक पहुंचने में विश्वास नहीं रखता।